Vishdhar (विषधर) : आईना दिखाती एक छोटी सी कविता | Ashish Raj Kiran | Official Author Website
बारिश, बादल, चांद, हवाएं और ये शमा प्यारा, मुझे बेकार लगता है तुम्हारे बिन जहां सारा : Ashish Raj Kiran

Vishdhar (विषधर) : आईना दिखाती एक छोटी सी कविता

Vishdhar (विषधर)

Vishdhar Hindi Poem by Ashish Raj Kiran

एक  दिन निकला मैं घर से रात को,
पथ पर पड़ी रस्सी समझ कर सांप को,
उठा लिया  मैंने उस काले नाग को। 

नाग  बोला - छोड़ दे मुझको मैं एक सर्प हूँ,
चल रहे कलयुग का एक फर्क हूँ। 

चौंक कर ढीला मैंने उस भुजंग को,
काट ले ना वो किसी मेरे अंग को। 

नाग बोला :
काट कर तुझको मैं आखिर क्या करूँ,
काट लूँ तुझको व उलटा मैं मरुँ। 

शायद तुझको ये अभी मालूम नहीं,
असली विषधर तू है मैं नहीं। 

इंसान ही डसता है हर इंसान को,
बस में हो तो ड़स ले वो भगवान को। 

- Ashish Raj Kiran

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